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साँप और रस्सी

राजा राव

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 1992
पृष्ठ :459
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5797
आईएसबीएन :81-7201-226-8

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राजाराव का प्रसिद्ध उपन्यास द सर्पेट एंड द रोप (साँप और रस्सी) अंग्रेजी का श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपन्यास है।

Saanp Aur Rassi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

राजाराव का प्रसिद्ध उपन्यास द सर्पेट एंड द रोप (साँप और रस्सी) अंग्रेजी का श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपन्यास है। अपनी असमिता की खोज में लीन लेखक इसमें भारतीय और पश्चिमी दार्शनिक धारणाओं पर अद्वैतवाद की प्रभुता प्रतिपादित करता है। विदेशी वातावरण के बावजूद भारतीय मिथकों, अपाख्यानों, किस्सों-कहानियों के सहारे इसका ताना-बाना बुनता हुआ लेखक राधा और कृष्ण के दृष्टान्त के आधार पर सिद्ध करता है कि सच्चा प्रेम तन से नहीं, मन बुद्धि और अहंकार से भी परे है—नितान्त निर्वैयक्तिक और अखंड। इस कृति में एक साथ दार्शनिक गहनता, काव्यात्मक व्यंजकता, महाकाव्यात्मक दृष्टि तथा भारतीयता का आस्वाद मिलता है।

यह एक युवा भारतीय रामास्वामी की कहानी है जो इतिहास में शोध हेतु फ्रांस जाता है और वहाँ इतिहास की व्याख्याता मादलेन से मिलता है, उससे विवाह करता है। किन्तु जल्दी ही वे एक-दूसरे से दूर हटने लगते हैं। रामास्वामी महसूस करता है कि विवाह, प्रेम और परिवार को लेकर पूर्व एवं पश्चिमी की सोच में बहुत बड़ी खाई है। यह एहसास और भी गहरा होता है जब वह कैम्ब्रिज शिक्षित सावित्री से मिलता है जो उग्र आधुनिका होने के बावजूद पूरी तरह से भारतीय है। मादलेन पहले रामास्वामी की जिन्दगी से बाहर चली जाती है और बाद में इस दुनिया से भी। रामास्वामी महसूस करता है कि सावित्री के प्रति उसका प्रेम उस प्रकार का है जो शारीरिक मिलन से पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता बल्कि सावित्री उसके अर्न्यामी से मिलने के लिए अनिवार्य तथा उन्नत कोटि के प्रेम का साधन मात्र है।

रामास्वामी के अहं को समाप्त कर उसे इस चरम उपलब्धि के योग्य बनाने वाले गुरु के निकट जाने के निर्णय के साथ उपन्यास समाप्त होता है। आधुनिक उपन्यास के सभी परिचित लक्षणों को झुठलाती हुई यह कृति अपने-आप में अत्यन्त दुरूह और विचारसंकुल रचना है। इस दुरूहता में राजा राव की अपनी जटिल भाषाशैली का भी काफ़ी योग रहा है जिसकी झलक इस हिन्दी-अनुवाद में भी व्याप्त है। मूल उपन्यास के अंग्रेज़ीतर पाठांशों का हिन्दी-अनुवाद साहित्य अकादेमी द्वारा प्रदत्त अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित है। इसमें आए व्यक्तियों और स्थानों के नामों का देवनागरीकरण भी अकादेमी की सूचनाओं के अनुसार है।


साँप और रस्सी

 

 

मैं ब्राह्मण पैदा हुआ यानी, ब्राह्मण यानी सत्य के प्रति समर्पित- ‘ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जानता है’ इत्यादि। पर पौराणिक और उपनिषदिक आदिपूर्वज श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य के बाद मेरे कितने पूर्वज सचमुच सत्य को जानते थे, सिवा मनीषा माधव में सहायता के जिसने एक राज्य स्थापित किया, बल्कि एक राज्य के निर्माण में सहायता की और श्रीशंकर के पश्चात् कुछ गूढ़तर वेदान्तिक ग्रन्थों की रचना की ? मुझे बताया गया है कि उसके अलावा और भी थे जो परमात्मा से साक्षात्कार करने के लिए घर-गृहस्थी और नदीतट के क्षेत्रों को छोड़, दूर-दराज के पर्वतों और आश्रमों में घूमते रहे। उनमें–से कुछ को परमात्मा का साक्षात्कार हआ भी और उन्होंने मन्दिरों का निर्माण कराया। पर जब वे मरे—क्योंकि मर तो वे गए ही थे—तब उन्हें भी किसी तालाब या बाग़ के किनारे या दो नदियों के संगम पर जला दिया गया होगा। उन्हें भी पता चल गया होगा कि वे मरे नहीं। मैं उन्हें अपने भीतर महसूस करता हूँ और जानता हूँ कि उन्हें पता था कि वे मरे नहीं ? वह मेरे सिवा और कौन हो सकता है। इस प्रकार मेरे पूर्वज एक-एक करके मर गए, जला दिए गए और उनके भस्मावशेष नदियों में प्रवाहित कर दिए गए।

जब भी मैं नदीं में खड़ा होता हूँ तब मुझे याद आता है कि जब मैं छोटा था, जिस दिन राक्षस ने चाँद को खा लिया था और दिन को ग्रहण लग गया था, मैं तिल और कुशा अर्पित कर पितरों के प्रति अपनी पुत्रोचित श्रद्धा व्यक्त किया करता था। इसके अलावा, मैं अच्छा ब्राह्मण था। मैं व्याकरण और ब्रह्मसूत्र जानता था, चार वर्ष की उम्र में ही उपनिष्ट पढ़ता था, सात वर्ष का होने पर मुझे यज्ञोपवीत धारण कराया गया था, क्योंकि मेरी माता की मृत्यु हो चुकी थी और पिता ने पुनर्विवाह कर लिया था। मुझे हर वर्ष माँ का श्राद्ध करना होता था। इस प्रकार गीले कपड़ों में निराहार तथा माथे पर चंदन लगाए मैं भक्ति पूर्वक अपनी माँ की समाधि के आगे गिर गया था और सिसक रहा था। मैं अनाथ पैदा हुआ और अनाथ ही बना रहा। मैं दुनिया भर में घूमा हूँ और होटलों के कमरों तथा रेलगाड़ियों में सिसकता रहा हूँ। मैं ठंडे पहाड़ों को देखकर सिसकता रहा हूँ, क्योंकि मेरी माँ नहीं थी। एक दिन, जब मैं बाइस वर्ष का था, पाइरीनीस के एक होटल में बैठा सिसक रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि मैं अपनी माँ से फिर कभी नहीं मिल पाऊँगा।

लोग कहते हैं कि मेरी माँ बहुत सुंदर और पुण्यात्मा थी। मेरे दादा किटन्ना कह करते थे—‘‘बेटा, उसकी आवाज़ स्वयं झंकृत होनेवाली उस वीणा के समान थी जिसे संध्यावंदन के बाद मन्दिर में स्तंभ के साथ टिकाकर रख दिया हो। उसकी आवाज रामेश्वरम् मन्दिर के संगीत-स्तंभों के समान थी, वह गहराइयों से किसी अज्ञात आकाश से निनांदित होती थी और ऐसा लगता था कि भगवान इस आराधना से और दप्तिमान हो गए हैं। वह मुझे देवदासी चन्द्रम्मा की याद दिलाती थी। उसकी भी वैसी ही आवाज़ थी। यह तुम्हारे पैदा होने से बहुत पहले की बात है।’’ बात समाप्त करते हुए दादा बोले—‘‘यह मैसूर की बात है और मैं पचास वर्ष से वहां नहीं गया हूँ।’’

दादा किटन्ना सज्जन पुरुष थे, हमारे बीच उपस्थित एक वीरपुरुष। असंभव के प्रति नैसर्गिक प्रेम मुझे उन्हीं से मिला होगा। मैं यह कल्पना कर सकता हूँ कि यह इमारत अभी-अभी उड़ने का फ़ैसला कर सकती है, स्टालिन संत बन सकता है या सभी जापानी बौद्ध भिक्षु बन गए हैं या महात्मा गाँधी इस समय हमारे साथ चल रहे हैं। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं रेल की पटरी को खड़ा करवा सकता हूँ या हथिनी चौबीस दिन में बच्चा पैदा कर सकती है। मैं देख सकता हूं कि एक विमान पर्वत पर तैर रहा है और सावधानी से एक चोटी पर बैठ गया है, या मैं फ़तहपुर सीकरी जाकर शहंशाह अकबर से बात कर सकता हूँ। जब मैं भ्यारसाइ में होता हूँ तो यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि मैं रोया सेलेई की भद्दी आवाज़ सुन रहा हूँ या मो में होते हुए सोच सकता हूँ कि बोसुए अपनी हथेली पर नसवालर रगड़ रहा है, जैसा कि भारत में लोग अभी भी करते हैं और एक चुटकी मुझे भी पेश कर रहा है। मैं उससे छींक मार सकता हूँ और बोसुए को एक शोकमय भाषण देते सुन सकता हूँ। क्योंकि बोसुए का विश्वास था, और रोया सलेई का भी, कि वह कभी नहीं मरेगा। और यदि वे मर गए तो मैं पूछता कि वे सचमुच कहाँ गए हैं।

दादा किटन्ना एक और तरह से भी वीरपुरुष माने जा सकते थे। वे प्रचण्ड घोड़े को भी इतनी आसानी से वश में कर सकते थे कि वह जहाँ न जाना चाहे वहाँ भी ले जाया जा सकता था। मैं यह किस्सा सुनते-सुनते ही बड़ा हुआ था कि किस प्रकार दादा किटन्ना ने अपने घोड़े सुन्दर को एक शाम चन्द्रपुर के जंगल में सचमुच धकेल दिया था। जंगल के बीचों-बीच उसे एक शेर मिला था और सुन्दर शेर महाराज के ऊपर से ऊँची छलाँग लगाई-इतनी ऊँची कि उससे टकरा कर शरीफे टूटकर उसकी पीठ पर बिखर गए। इससे पहले कि दादा को पता चलता कि वे अपने कमरबंद और मराठा काठी के साथ कहाँ हैं, सुन्दर उनके आँगन में आ खड़ा हुआ था। उस समय दीप जलाए जा रहे थे।

जब घुड़साल के नौकर तौदय्या ने उसकी हिनहिनाहट सुनी तो वह घोड़े को नहलाने के लिए तालाब पर ले गया। दादा संध्या स्नान के लिए गुसलख़ाने में चले गए। गरम पानी से स्नान करना पसंद करते थे—चाची सीतम्मा लोटे भर-भर कर उन्हें देती जाती थी और वे अपने शरीर को रगड़ते रहते थे जब तक कि वह केले के नन्हें पेड़ की तरह चमक नहीं उठता था स्नान के बाद पूजा पर बैठ गए। और जब अचक्का ने पूछा कि सुन्दर के सारे शरीर पर इतनी खरोंच कैसे लगी तो उन्होंने शेर और छलाँग की बात बताई। यदि यह घोड़ा आकाश में उड़ जाता और फिर पावन भूमि वृन्दावन में उतरता तो भी उन्हें अधिक आश्चर्य न होता। ऐसे थे दादा किटन्ना ! वे तीन वर्ष सुन्दर पर चढ़ते रहे, फिर यह गोड़ा एक प्रकार की पेचिश से मर गया। आप जानते हैं, घोड़े भी तो मरते हैं हमने उसे किट्टूर पहाड़ी के शिखर पर गाड़ दिया, वंशी और ज़ूरदोज़ी के काम के साथ। हम हर साल उसकी समाधि पर जाते हैं और हैदराबाद में होने के कारण उसे मलमल की गुलाबी चादर से ढक देते हैं, जैसा कि मुसलमान करते हैं। हम सोचते हैं कि घोड़े अरब से आए थे इसलिए उन्हें मुसलमानों की तरह द़फनाने की ज़रूरत है। सुन्दर अब कहाँ है ? कहाँ ?

दादा के लिए असंभव सदा संभव होता था। ब्राह्मण होते हुए भी वे बन्दूक या तलवार से कभी नहीं घबराते, एक बार भी नहीं। फिर भी उनकी प्रार्थना में कितनी गहराई होती थी। चाची सीताम्मा कहा करती थी कि जब वे पूजा घर से बाहर निकलते हैं तो उनके मुखमंडल पर धर्मराज की आभा होती है।

पर मुझे बन्दूक़ और तलवार से डर लगता है और हिंसा की छोटी से छोटी चाल से भी मैं सौ कोस दूर भाग सकता हूँ। पर एक बार सौ कोस चले जाने पर मैं हजार कोस लौट सकता हूँ, क्योंकि मुझे भय से सचमुच भय नहीं है। मुझे केवल भय है।
मुझे नदियों और झीलों से प्यार है और जल के किनारे बसे गांव में आसानी से अपना घर बसा सकता हूँ। मुझे महलों से प्यार है, उनकी प्रतिध्वनि के कारण, अंधकार के अतिरिक्त कभी और कुछ न देख पाने के उनके बोध के कारण। इमारतें मुझे बूढ़ी और आदरणीय औरतों की याद दिलातीं हैं जो कभी नहीं मरतीं। वे दूसरों की, मेरा अभिप्राय है परिवार के अनाथों की, जिनकी वे सदा चाचियाँ-दादियाँ होती हैं, इतनी देखभाल करती हैं कि वे स्वयं सदा जवान रहती हैं। ऐसी ही एक थी चाची लक्षम्मा।

उनका विवाह एक पुरोहित से हुआ था और जब यह मरा तब वह सात-आठ वर्ष की थी। तभी से मेरे चाचों और उनकी बेटियों, मेरी माँ की चचेरी-मौसेरी बहनों और उनके पोते-पोतियों की वही देखभाल कर रही हैं। एक सच्चे घर-गृहस्थ में अनाथ कभी अनाथ नहीं रहता लक्षम्मा ने, हाँ उसी ने, बच्चों के सभी कपड़े अठारहवीं सदी के अपने एक लोहे-शीशम के संदूक में संभाल रखे थे, जो केन्द्रीय हाल में पड़ा रहता था। घर में किसी की मृत्यु होने पर ही यह संदूक खुलता था और कपड़ों को धूप लगवाई जाती थी। कहते हैं, उनमें से कुछ कपड़े पचास साल पुराने थे। उस दिन, यानी सात-आठ साल पहले जब बताया गया कि काकी लक्षम्मा, जो मेरे दादा से भी कई साल बड़ी थीं, सचमुच मर गई हैं तो मुझे विश्वास नहीं हुआ मैं सोचता था कि वह तीन सौ साल ज़िन्दा रहेंगी। वह न कभी शिकायत करती थीं, न कभी आह भरती थीं। वह कभी नहीं रोईं। जब वह मरी तो हम बिलकुल नहीं रोए, क्योंकि मेरी समझ में तो नहीं आता कि मृत्यु का अर्थ क्या है।

मेरे पिता मुझे प्यार करते थे। उन्होंने मुझे कभी लक्षम्मा के हाथों नहीं पड़ने दिया। उन्होंने कहा—‘‘मेरे बेटे, काकी से बदबू आती है। मैं चाहता हूँ कि तुम नायक बनो, राजकुमार बनो।’’ कुछ समय पहले मेरी माँ मरी थी। लगता है, उसे दिव्यदृष्टि मिली थी। उसने मेरे पिछले तीन जन्म देखे और हर एक में मैं उसका बेटा था। हर बार मैं उसका सबसे बड़ा, लंबा, छरहरा, गहरी आवाज़ वाला, विशिष्ट और सुन्दर बेटा था। एक जन्म में तो मैं राजकुमार था। इसलिए सदा हीरे-जवाहरात से मेरा अलंकरण किया जाता था—मेरे माथे, वक्ष और कानों में हीरे सजे रहते थे। कहते हैं जब वह मरी उसने सुनार के पास किसी को यह पूछने के लिए भेज रखा था कि मेरे केश-पुष्प बन गए कि नहीं। जब वह मरी तो उन्होंने उसे सपेद फूलों से ढक दिया, कोयंबतूर से चमेली और चामुंडी से चंपा मंगवाकर, और फिर उस पर खूब कुंकुंम छिड़ककर वे उसे श्मशान –घाट ले गए। उन्होंने पूरी तरह से मेरा क्षौर कर्म किया और जब वे लौटे तो उन्होने मुजे बंगाली चना और कुछ मिठाई दी। पर मैं कुछ न समक्ष सका कि हुआ क्या है, न अभी तक वह मेरी समझ में आया है। मैं जानता हूँ कि मेरी माँ—मेरी माँ गौरी—मरी नहीं है, फिर भी मैं अनाथ हूँ। क्या मैं सदा अनाथ रहनेवाला हूँ ?

मेरी सौतेली माँ तीन बच्चे छोड़कर मर गई थी। सरोज, सुकुमारी और सबसे बड़ी कपिला—और मेरे पिता ने तीसरी बार विवाह किया, यह एक अलग कहानी है। मेरी नई सौतेली माँ मुझे बहुत प्यार करती थी। मैं उसकी मधु मुस्कान के बिना और उस गीत के बिना जो घर में ताम्र-पात्रों की तरह चमकता था, किसी घर की कल्पना भी नही कर सकता था। जब वह मुस्करती तब उसकी मुस्कान पूरे चेहरे पर कानों तक फैल जाती थी और मैं जो भी माँघतास, वह मुझे दे देती थी, फिर भी, मैं अपनी माँ को याद करके रोया करता था। फिर, मेरे पिता की मृत्यु हो गई।

वे दूसरे चन्द्रमास की तृतीया को मरे थे जब थोड़ा-थोड़ी बरसात शुरू हो गई थी। अपने पिता की मृत्यु के बारे में बताने के लिए मेरे पास कुछ है ही नहीं सिवा इसके कि मैं उन्हें प्यार नहीं करता था और यह भी कि उनके मरने के बाद जब उनका शरीर शुद्ध सफेद राख जैसा हो गया तब मैंने उन्हें जाना और प्यार किया। अभी भी वे मेरे सपनों में आते हैं और कहते हैं, ‘‘बेटे, मेरे सबसे बड़े बेटे, तुमने मुझे प्यार क्यों नहीं किया ?’’
मैं पश्चाताप नहीं कर सकता, क्योंकि मैं नहीं जानता कि पश्चाताप क्या होता है, क्योकि पहले मुझे इस पर विश्वास करना चाहिए कि मृत्यु होती है। सच्चाई यह है कि मैं विश्वास ही नहीं करता कि मृत्यु है। तो, मैं किस के लिए पश्चाताप् करूँ।


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